7/15/2011

तेरापंथ स्थापना के 252वें वर्ष (15 जुलाई) पर विशेष

तेरापंथ स्थापना के 252वें वर्ष (15 जुलाई) पर विशेष

प्रभो यह तेरापंथ महान
मिला मिलेगा जिससे सबसो ज्ञान अध्यात्मिक अवदान
प्रभो यह तेरापंथ महान।।

आचार्य तुलसी के इन शब्दों से पता चलता है कि तेरापंथ धर्मसंघ से क्या मिलेगा और क्या मिला? क्या है तेरापंथ धर्म संघ? क्यों जैनधर्म में तेरापंथ की पहचान विरल संघ के रूप में होती है। बाईस टोले संप्रदाय होने के बावजूद क्यों एक और संघ का उदय हुआ? भगवान महावीर जैन धर्म के 24वें तीर्थंकर थे. उनके द्वारा प्रतिपादित सिद्धांतों, विचारों को उनके अनुयायी ने माना इसलिए वे जैन कहलाए।
तेरापंथ धर्मसंघ की स्थापना आचार्य भिक्षु ने 1817 में की थी। वे सम्वत 1808 में आचार्य रघुनाथजी के पास दीक्षित हुए। वे गहन आगमज्ञ, तत्वज्ञ साधु के रूप में पहचाने जाते थे। उन्हें सभी आचार्य रघुनाथ जी का योग्य उत्तराधिकारी समझते थे। उस समय राजनगर के श्रावकों ने चारित्रिक शिथिलता को देखते हुए साधुओं को वंदना व्यवहार बंद कर दिया, तब आचार्य रघुनाथजी ने मुनि भीखणजी को श्रावकों को समझाने राजनगर भेजा, श्रावक तो समझ गए लेकिन भीखणजी को उनकी बातें युक्ति संगत लगी और उनका अन्तस डोल गया। उन्होंने फिर से आगमों का दो-दो बार गहन अध्ययन किया और अनुभव किया कि साधु-साध्वी शुद्ध साध्वाचार का पालन नहीं कर रहे हैं, उनमें चारित्रिक शिथिलता आई है और पांचवें आरे के नाम पर वे अपनी कमियों को छिपा रहे हैं। तब उन्होंने आचार्य रघुनाथजी से इस विषय पर दो वर्षों तक गहन विचार-विमर्श किया और वि.सा. 1817 को बगड़ी नगर में अभिनिएक्रमण कर दिया.
मुनि भीखण का उद्देश्य नये संघ का प्रवर्तन करना नहीं वरन् शुद्ध साध्वाचार की पालना थी और इसी उद्देश्य की पूर्ति के लिए तेरह साधुओं ने संघ से संबंध विच्छेद कर दिया। तेरह साधु के धर्मक्रांति का साथ तेरह श्रावकों ने दिया जिस पर दीवान फतेहमलजी के साथ के सेवग जाति के कवि ने कहा -
सुवण्यो रे शहर रा लोगा।
अै तेरापन्थी तंत।।
जब भीखणजी ने यह सुना तो तत्काल वंदनासन की मुद्रा में बैठकर बोले – हे प्रभो यह तेरापंथ, पांच महाव्रत, पांच समिति, तीन गुप्ति का पालन जो साधु करे वो तेरापंथी है।
आचार्य भिक्षु ने प्रथम चातुर्मासिक प्रवास हेतु केलवा में प्रवेश किया। वहां के श्रावकों ने उन्हें चंद्रप्रभ मंदिर में ठहराया। वहां एक यक्ष का निवास था और उसी मंदिर में एक अंधेरी ओरी थी। दिन के उजाले में भी वहां कोई नहीं जाता था। वहां पर आचार्य भिक्षु रुके और सत्य का ऐसा प्रभाव कि एक लौकिक देव (यक्ष) लौकोत्तर धर्म की रक्षा कर रहा है।
1808 को आषाढ़ी पूर्णिमा के दिन मुनि भिक्षु ने बाकी साधुओं के साथ देव गुरु धर्म की साक्षी से भाव दीक्षा ग्रहण की। विभिन्न विरोध, संघर्ष के बाद भी वे अडिग रहे। विभिन्न संप्रदाय में फैली विषमताओं से तेरापंथ को दूर रखने के लिए उन्होंने एक लेखपत्र बनाया जिसमें साधु-साध्वी के लिए विभिन्न मर्यादाओं का निर्माण किया। जो आज 251 वर्ष बाद भी तेरापंथ संघ के आचार्य के पास सुरक्षित है। उसके अनुसार सभी साधु-साध्वी एक आचार्य की निश्रा में रहेंगे। बिना आचार्य की आज्ञा के विहार नहीं करेंगे, चातुर्मास नहीं करेंगे, स्वयं के शिष्य नहीं बनाएंगे इत्यादि। आचार्य भिक्षु के बाद आचार्य भारमलजी, आचार्य रायचंदजी, आचार्य जीतमलजी ने आचार्य पद के दायित्व को निर्वाह किया।
आचार्य जीतमलजी एक ओजस्वी, तेजस्वी व आचार्य भीखणजी की प्रतिकृति कहे जाते थे, उनके समय में तेरापंथ के प्रति विद्रोह कम हो गया था। उन्होंने संघ को मजबूती प्रदान करने के लिए एकता बनाये रखने के उद्देश्य से विभिन्न कार्य किये। उन्होंने पुस्तकों को संघीयकरण किया, जिसके अनुसार किसी भी साधु साध्वी की पुस्तक पर उनका नहीं वरन् आचार्य का अधिकार होगा। उन्होंने साधु साध्वी की गोचरी व्यवस्था को नया रूप दिया। साध्वी समाज की व्यवस्था के लिए साध्वी प्रमुखा पद का सृजन किया। उन्होंने राजस्थानी भाषा में जितने पद्य परिमाण की रचना की, संभवत: अभी तक किसी ने नहीं की।
चतुर्थ आचार्य जीतमलजी के पश्चात आचार्य मद्यराज जी बने। वे संस्कृति के पंडित थे। उनके बाद आचार्य माणक गणी बने। वे अल्पायु में अपने उत्तराधिकारी की नियुक्ति से पूर्व ही समाधिस्थ हो गये। तब संघ के वरिष्ठ साधुओं ने मिलकर आचार्य डालचंदजी की नियुक्ति की। बिना किसी विवाद के सभी साधु-साध्वी, श्रावक समाज ने इस फैसले को स्वीकार किया। यह तेरापंथ धर्मसंघ के लिए सबसे बड़ी कड़ी कसौटी का समय था। आचार्य डालचंद तेजस्वी आचार्य बने। उनके पश्चात आठवें आचार्य कालुगणी बने। उनके समय में 410 दीक्षाएं हुईं। संस्कृति का अभूतपूर्व विकास हुआ। समय सिद्धांतों की समीक्षा कर नये रहस्यों के उद्घाटन का क्रम उनके ही युग से प्रारम्भ हुआ।
उनके बाद सबसे कम उम्र मात्र 22 वर्ष में ही मुनि तुलसी आचार्य तुलसी बने। उनका कार्यकाल तेरापंथ धर्मसंघ का स्वर्ण युग था। उन्होंने युगीन आवश्यकताओं के अनुरूप परिवर्तन किये। उन्होंने सभी कुरीतियों को समाप्त करने के लिए नया मोड़ आंदोलन प्रारम्भ किया। जिससे पर्दा प्रथा, विधवाओं का छ: माह तक कमरे में ही रहना, महिला का दूसरा विवाह न करना, मृत्युभोज करना, पल्ला प्रथा बंद जैसी कुरीतियां समाप्त हुईं।
उन्होंने साध्वियों के शिक्षा की तरफ ध्यान दिया। दीक्षा से पूर्व शिक्षा के लिए परमार्थिक शिक्षण संस्था बनाई। विदेशों में धर्म प्रसार के लिए साधु व श्रावक के बीच की कड़ी समण श्रेणी बनाई। जीवन में प्रमाणिकता के लिए अणुव्रत, जीवन विज्ञान का अवदान दिया। सुदूर यात्राएं की। नारी शक्ति को जगाने के लिए महिला मंडल के रूप में एक सशक्त मंच दिया। तेरापंथ महासभा बनाई। बच्चों के समुचित विकास के लिए ज्ञानशाला प्रारम्भ हुई। आगम संपादन का कार्य संपन्न हुआ। उन्होंने कहा- जो करे विरोध उसे समझे विनोद, निज पर शासन फिर अनुशासन।
उन्होंने आचार्य पद का विसर्जन कर अपने उत्तराधिकारी युवाचार्य महाप्रज्ञ को आचार्य पद प्रदान किया। जहां आज कुर्सी की इतनी मारामारी हो वहां सर्वोच्च पद का त्याग उनकी महानता को दर्शाता है।
आचार्य महाप्रज्ञ प्रेक्षाध्यान के प्रणेता संस्कृति के आशुकवि, विराट ज्ञान के अतुल भंडार थे। उन्होंने आमजन तक अपनी बात पहुंचाने अहिंसा यात्रा प्रारम्भ की। वे तेरापंथ धर्मसंघ के सर्वाधिक वय प्राप्त आचार्य थे। उन्होंने आगम संपादन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। कई ग्रंथों की रचना की। आचार्य तुलसी की छाया थे वे। आचार्य तुलसी अक्सर कहते महाप्रज्ञ कैसा महाप्रज्ञ जैसा।
वर्तमान में तेरापंथ धर्मसंघ के ग्यारहवें आचार्य, आचार्य श्री महाप्रज्ञ श्री महाश्रमणजी अपनी धवल सेना के साथ जन मानस में धर्म की अजस्त्र धारा प्रवाहित कर रहे हैं। 251 वर्षों में तेरापंथ में सिर्फ ग्यारह आचार्य ही हुए। जहां हर साधु-साध्वी आचार्य बनने की क्षमता रखते हैं लेकिन आचार्य के प्रति समर्पित ज्ञान दर्शन चरित्र के विकास में तत्पर, आचार्य की आज्ञा का पालन करता है। मर्यादाओं का पालन करता है। एक ऐसा धर्म संघ जहां अनुशासन को मर्यादा महोत्सव के रूप में मनाया जाता है, जहां गुरु शिष्य के प्रति और शिष्य गुरु के प्रति समर्पित है। एक आचार एक विचार, एक आचार्य की त्रिवेणी जब बहती है तभी वह धर्मसंघ एक रह सकता है। पूरे विश्व में एक आचार्य की निश्रा में इतने साधु-साध्वी और लाखों करोड़ों श्रावक और कहीं हो यह संभवत: संभव नहीं है। जब तक चतुर्विध धर्मसंघ समर्पित रहेगा, तब तक तेरापंथ धर्मसंघ सूर्य की भांति चमकता रहेगा।

-करुणा कोठारी

कोई टिप्पणी नहीं: