होली पर रंग नहीं भ्रष्टाचार बरसे
वैसे तो होली आने से मन में कुछ नई तरंगें लहराने लगती हैं जो झूठ पर सत्य की विजय का प्रतीक है, जो बुराई परअच्छाई का प्रतीक है। इस बार इस त्यौहार का रूप बदल गया था, अब यहां लाल, पीले, नीले रंग नहीं दिखाई दे रहे थे, टेसू के फूल खिलने से पहले ही मुरझा गए। इस बार नई तरंगें नहीं आई, बल्कि बाढ़ आई वो भी घोटालों की। पता नहीं कब से यह सब चालू है लेकिन इन सबसे वो बेअसर हैं जिन्होंने इन घोटालों को अंजाम ये हंै।
कामनवेल्थ गेम्स हो या 2जी स्पेक्ट्रम, आदर्श हो या खाद्यान्न, चाहे यूएलसी घोटाला हो, हमारे नेताओं ने हजारों लाखों नहीं करोड़ों रुपयों से अपना घर भर दिया। आज के नेताओं के जैसे ही एक सेठजी थे, बहुत धनवान और उतने ही कंजूस थे। उनके दिमाग में हरदम यही चलता रहता कि कैसे वो अपना धन दुगुना करें। एक बार गांव में एक पहुंचे हुए संत महात्मा आए। पूरा गांव उनके प्रवचन के लिए आया पर सेठजी नहीं आए। जब संत को उनके न आने का कारण पता चला तो संत सेठजी के घर गए। संत ने सेठजी को एक सूई देते कहा कि सेठजी मैं तो घूमता रहता हूं, ये इतनी सी सूई मुझसे कहीं गुम हो जाएगी, तुम्हारे पास तो इतनी बड़ी तिजोरी है, तुम उसमें रख दो। जब मरोगे तो अपने धन के साथ इस सूई को भी लेते आना, मैं वहीं से ले लूंगा। संत की बात सुनकर सेठजी हंसने लगे, बोले आप संत हैं और आपको इतना भी नहीं पता कि मरते वक्त आदमी अपने साथ कुछ भी नहीं ले जा सकता मैं आपकी सूई कैसे लाऊंगा? तब संत ने कहा – जब तुम्हें ये बात पता है तो फिर इतना धन संचय क्यों? संत की बात ने सेठजी के आंखों से लालच की पट्टी हटा दी। लेकिन … हमारे नेता जो जानते-बूझते घोटालों को अंजाम दे रहे हैं, जिनकी जेब में कभी हजार रुपए नहीं होते थे, आज उनके पास हजार करोड़ की प्रापर्टी कहां से आ गई?
जिस देश के नेता भ्रष्टाचार में इतने लिप्त हैं, जहां की राजनीति इतनी गंदी हो गई है, वहां का आम आदमी कितना त्रस्त है। स्विस बैंकों में भरा काला धन कितने नेता अपने साथ ले जाएंगे वो तो पता नहीं पर यदि यही धन आम आदमी के पास होता तो आज भारत विकास। शील नहीं विकसित देशों की गिनती में होता।
ये कैसा लोकतंत्र है, जहां की युवा पीढ़ी आज किसी भी नेता को अपना आदर्श मानने से डरती है। आरोप प्रत्यारोप से घिरे नेता सिर्फ अपनी जेबें भरे इस चाह में देश को बेचने के लिए भी तैयार हो जाएंगे। ये नेता कहने के लिए आम जनता के प्रतिनिधि हैं, लेकिन आज आम जनता े सबसे ज्यादा दुखी इन्हीं से है। महंगाई के नाम पर प्याज, टमाटर, दालें, जैसी जरूरत की चीजों को इतना महंगा कर दिया है कि गरीब ऊपर उठने के बजाए और ज्यादा गरीब हो गए हैं। सोने की चिडिय़ा भारत घोटाले की चिडिय़ा, चिडिय़ा नहीं चील बन गया है। जहां के नेताओं की गिद्ध दृष्टि से आम आदमी का आराम या खुशी छिप ही नहीं पाती है। ऐसे समय में आजकल मोबाइल पर घोटाले के लिए एक एसएमएस आ रहा है – भारत में एक फिल्म बन रही है लूट ले इंडिया। जिसमें हीरो सुरेश कलमाड़ी, हीरोइन नीरा राडिया, विलेन राजा, गेस्ट अपीरियंस अशोक चव्हाण, कामेडी शरद पवार, कोरियोग्राफी शीला दीक्षित, प्रोड्यूसर 100 करोड़ गरीब भारतीय लिमिटेड कंपनी।
ऐसे नेताओं को जेल में बंद कर उनका खर्चा उठाने से अच्छा है कि उन्हें आम आदमी को सौंप दे। लोग आने वाली होली पर नेताओं के इस लालच की होली जलाने को तैयार हैं। लोग उन्हें किसी न्यायिक जांच, जेपीसी, इन्क्वायरी के सबूतों की जरूरत नहीं है। जरूरत है एक ऐसी जंग छेडऩे की जो हमारे लोकतांत्रिक अधिकारों का उपयोग करवा कर हमें ऐसे नेताओं से मुक्त कर सके।
-करुणा कोठारी
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