6/12/2011

शब्दों की दुनिया

मैंने तो अपने जीवन में स्वरों को जाना है, मेरी हर अभिव्यक्ति उन्हीं से ही, उन्हीं को मैंने जीवन में पहचाना है, पर अब ऐसा लगता है कि शब्दों के बिना कई बातें अनकही रह जाएगी। वे मेरे साथ ही चली जाएंगी। इसीलिए शब्दों की दुनिया में कदम रख रही हूं। अपनी भावनाओं को साझा कर रही हूं।
बोले हुए शब्द सुनने वाले के दिल तक पहुंचने से पहले अपना अर्थ खो देते हैं, मन में उठे विचार जुबां तक आते-आते अपना असर खो देते हैं। नजर कुछ कहना चाहती है किन्तु पल-पल झपकती पलक अंदाज बदल देती है। ख्वाबों और ख्यालों की पाकीजगी आखिर किस माध्यम से कायम रहे? बहुत सोचने पर केवल एक रास्ता मिला खुद को अभिव्यक्त करने का और वह है शब्दों की दुनिया… शब्दों की रंगीन दुनिया से मेरा रिश्ता नया है लेकिन अनजाना नहीं है। मेरा यह रिश्ता भावनात्मक तादाम्य का है, क्योंकि यह रिश्ता शर्तहीन है।
गलत न समझे जाने के भय से मुक्त, अभिव्यक्त होने की चाह इंसान को कहां से कहां ले जाती है। मरुस्थल सी जिंदगी में अभिव्यक्ति की तलाश नई भी नहीं है और अजीब भी नहीं है। हर इंसान खुद को अभिव्यक्त करना चाहता है लेकिन कभी शब्द साथ नहीं होते तो कभी विचारों के झंझावत से हम खुद ही नहीं निकल पाते।
विचारों की अभिव्यक्ति नितान्त आवश्यक है। क्या कभी सोचा है कि यदि हम अपनी भावनाओं को ही नहीं कह पाए तो…? क्या होगा तब…? तो हमारी निजता तथा स्वाभाविकता हमारे लिए भ्रम तथा अफवाहों का अंधड़ रच देगी।
इंसान सोचता है कि वह जो करता है उससे कोई फर्क नहीं पड़ता? दरअसल हम गलत दिशा में अच्छाई को नापने की कोशिश करते हैं। हम सोचते हैं कि जरूरत पडऩे पर ही खुद को अभिव्यक्त करना चाहिए लेकिन इतना तो सोचकर देखिए कि जब तक हम खुद को अभिव्यक्त नहीं करेंगे कोई हमें कैसे समझेगा? हम किसी को वही चीज दे सकते हैं जो हमारे पास है, जिस तरह प्यार देने पर प्यार मिलता है, सम्मान देने पर सम्मान मिलता है, उसी तरह खुद को अभिव्यक्त करने पर व्यक्तित्व को एक पहचान का अहसास मिलता है।
हम सभी को जिंदगी मिली है हमें पूरा हक है कि हम इसे जीएं। जब भी कभी जिंदगी की किताब एक पन्ना और पलटें, उस पर गाढ़ी स्याही लुढ़के या कहीं रोशनी का रंग बिखरे, इन सभी एहसासों को बयां करने के लिए शब्दों का साथ होना जरूरी है।
हमारी जिंदगी के रंगदान में जितने भी रंग होते हैं वे हम सभी देखते हैं। उत्साह, उमंग, तालियां, शाबासी, खुशी, आंसू, उदासी, गम चाहे जो भी एहसास हो हम उसे महसूस करते है। कभी किसी बात पर हम भीतर से हुलस उठते हैं तो कभी कोई घटना हमारे भीतर सहेज कर रखी गयी यादों के कांच की तरह चटखकर टूटन की आवाज पैदा कर देती है। इस टूटन की आवाज को, खुशी के एहसास को दूसरों तक पहुंचाने के लिए शब्दों को माध्यम बनाना बेहद जरूरी है।
कहने की हो कोई बात।
या हो खुशी का कोई एहसास।।
नहीं चाहिए किसी कांधे का सहारा।
मिल जाए अगर शब्दों का किनारा।।

- ज्योति सामोता (नाथद्वारा)

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