8/01/2011

wo pagli

मेरे घर के सामने सिग्नल पर एक पगली अक्सर बैठी रहती है। जब मैं अपनी बच्चियों को स्कूल छोडऩे या लेने जाती हूं, तो वो बड़ी खुश होकर चिल्ला-चिल्ला कर मेरी बेटियों को बाय करती है। मुझे कभी-कभी बड़ा डर लगता है कि कहीं वो मेरी बेटियों को नुकसान न पहुंचा दे। वैसे वो बड़ी शांत सी रहती है कभी आने-जाने वाले को परेशान नहीं करती, कभी किसी पर पत्थर नहीं फेंकती, बस चुपचाप अपने पास रखी एक गुडिय़ा से खेलती रहती है। कोई कुछ देता है तो खा लेती है नही तो, छीना-छपटी करके कभीकिसी से कुछ लेते हुए नहीं देखा। सिग्नल पर जब कोई गाड़ी रुकती और उसमें लड़की होती तो वो बड़ी खुश होकर नाचने लग जाती, पता नहीं कहां से आई है, अब तो सब उसकी आदतें ंजानते हैं कभी कोई खाना बचा हो तो मैं उसे दे देती हूं। अपने पुराने कपड़े भी दे देती हूं लेकिन वो कभी उन कपड़ों को पहनती नहीं बल्कि किसी और को दे देती है पता नहीं किन कर्मों की सजा वो इस रूप में पा रही है।
मेरी बेटियों का स्कूल पास में ही था अत: मैं रोज उन्हें लाने-छोडऩे जाती थी। किसी दिन लेट हो जाती तो वो दोनों एक दूसरे को पकड़े आ जाती। वैसे तो वो बड़ी थी पर मुंबई की सड़कों पर भीड़-भाड़ वाले इलाके मेंवो अकेली और ऐसे मेरा मन ही नही मानता, मां का दिल जो था। ऐसी ही एक शाम तबियत खराब होने के कारण मैं बच्चों को लेेने नहीं जा सकी। और जब मेरी बेटियां घर आई तो मैं कांप गयी, बड़ी बेटी के सिर से खून निकल रहा था और छोटी डर से थर-थर कांप रही थी। मुझे समझ में नहीं आ रहा था क्या करूं ? बड़ी बदहवास की हालत में मंैने अपनी बेटी के सिर की पट्टी की, और छोटी बेटी को जब पूछा क्या हुआ तो वो सिर्फ पगली का नाम बता कर जोर-जोर से रोने लगी। और मेरे मन में दबी आशंका मुझे सही लगने लगी। मैंने बिना पूरी बात जाने निष्कर्ष निकाला कि जरूर पगली ने पत्थर मारा होगा।
मैं रोड पर जाकर जोर-जोर से पगली को डांटने लगी अपने दिये खाने और कपड़ों का एहसान बता कर न जाने क्या-क्या सुना दिया और वो चुपचाप अपनी गुडिय़ा को देख रही थी, मुझे गुस्सा आया और मैंने उसकी गुडिय़ा को उठाकर फेंक दिया।
अब तक जो लोग तमाशाबीन होकर ये नजारा देख रहे थे उनमें से एक आदमी जिसकी वहीं दुकान थी बोला ”मैडमजी जरा गुस्से को काबू करो जिसे आप इतना डांट रही हैं, आज अगर वो नहीं होती तो आज आपकी बेटी की लाश के आगे बैठकर रो रही होती। क्या!
क्या मतलब है आपका? क्या इसने मेरी बेटी को नहीं मारा तो फिर उसे लगी कैसे और मेरी बेटी ने इसका नाम क्यों लिया? तभी मेरी बड़ी बेटी बोली ”हां मां आज अगर आंटी नहीं होती तो मैं मर ही जाती।ÓÓ उसने बताया रेड सिंग्नल होने पर जब दोनों बहनें मस्ती से रोड क्रासकर रही थी, तभी एक ट्रक फुल स्पीड से सिंग्नल तोड़ कर आगे आ गया। वो तो समय पर इन आंटी ने हमे धक्का दे दिया वर्ना….$। ये तो ट्रक के नीचे गिर गई और हम बच गये। शायद इन्हें पैर को लगी है क्योंकि इनके पैर पर ट्रक का टायर गया था, मैं इन्हें ही लेने आई हूं ताकि अपने घर ले जाकर इनको दवा लगा सकूं। और वो बिना जवाब सुने उस पगली का हाथ पकड़ कर उसे घर ले जाने लगी।
मंै किंकितनमुढ़ होकर वहीं खड़ी, देख रही थी कि आज मेरी बेटी कितनी बड़ी हो गयी है। और मैं बिना सोचे समझे मैंने उसे कितना कुछ सुना दिया। दिल का पश्चाताप आंखों के रास्ते बाहर आने लगा। बिना सोचे-समझे ये मैंने क्या कर दिया। तभी मेरी छोटी बेटी ने मुझे झंझोड़ा बोली घर चलो ना मम्मा वो आंटी को दवा कौन लगाएगा?
और मुझे लगा क्याये सचमुच पागल है, आज की दुनिया में तो पूरे होशोहवाश में रहने वाले किसी को नहीं बचाते और ये पगली होकर भी……।
घर पर जाकर उस पगली को मरहम पट्टी करके मैं उसके लिये चाय बनाने चली गयी। मेरी बड़ी बेटी के लिए तो वो किसी भगवान से कम नही थी कि वो उससे बड़े प्यार से बात कर रही थी।
जब मैंने उसे चाय दी तो वो रोने लग गयी कहने लगी घर की चाय पीने को तो मैं तरस ही गयी। मुझे मेरी बेटियों के बारे में कहने लगी। उससे बात करते-करते मैंने उससे पूछा तुम कौन हो। तुह्मारा कोई परिवार है क्या? तुम्हें कुछ याद है?
मेरे सवाल सुनकर तो वो और जोर-जोर से रोने लग गयी, थोड़ी देर बाद जब उसका रोना बंद हुआ तो बोली ”कब से चाहती हूं कि मुझसे ये सवाल पूछे, मैं किसी को अपने बारे में बताऊं, मेरे दिल पर बहुत बड़ा बोझ है मैं उसे उठाते-उठाते थक गयी, पर कोई उस बोझ को उतारने नहीं आता। आज शायद आपको बताकर इस बोझ को कम कर पाऊं।
मैं पागल नहीं हूं पर इस दुनिया में अगर अकेला रहना है वो भी औरत को तो वो पागल हो जाती है। क्योंकि नारी परिवार के लिए होती है वो तो परिवार की धुरी होती है, वो कैसे अकेले रह सकती है। मैं भी किसी परिवार की धुरी थी, पर आज सिर्फ पगली हूं, पर मैं निश्चिंत हूं क्योंकि मैंपगली के इस खोल में सुरक्षित हूं।
मेरा नाम ऋतु है। मैं मध्यम वर्गीय परिवार में जन्मी, अपने पांच भाई बहनों के परिवार में सबसे छोटी। घर में पिता अकेले कमाने वाले और खाने वाले ७ जन। अपनी बड़ी बहनों के छोटे पुराने कपड़े पहन कर मैं बड़ी हुई। मुझसे बड़ी तीन बहिनें और एक भाई थे। मेरे जन्म के समय मां बाप ने सोचा लड़का होगा और हुई मैं अनचाही। और इसी अनचाही औलाद के रूप में वे मेरा पालन करने लगे। बचपना में किसी किताब में पढ़ा था कि अमरबेल किसी बड़े पेड़ पर चढऩा शुरू करती और उसी पेड़ से पोषण सोख कर वह बहुत जल्द पूरे पेड़ पर फैल जाती है, धीरे-धीरे वो पेड़ सूखने लग जाता है। मेरे परिवार में अपने ही खून के रिश्तों के बीच मुझे अमर बेल की तरह समझा जाता। मेरी जन्मदात्री ने मुझे कभी प्यार से गले नहीं लगाया, कभी मेरी चोट पर दवा नहीं लगायी, कभी-कभी लगता इससे अच्छा वो मुझे जन्म देते ही मार डालते।
तीन-तीन बेटियों की शादी ने पिताजी को समय से पहले ही बूढ़ा बना दिया, उनकी शादी में लिया कर्ज भी तो नहीं चुका पा रहे थे। मेरे भाई ने अपनी पसंद की लड़की से शादी कर ली और अपने ससुराल में ही घर जमाई बन कर रहने लगा। पिता के लिए तो मैं बचपन से ही बोझ थी अत: उन्होंने मेरी शादी ४० साल के आदमी से इसलिए कर दी क्योंकि वो मेरे पिता का कर्ज उतारने को तैयार हो गया। मैं महज १७ वर्ष कीऔर वो ४० वर्ष का। मेरे पिता ने उसके हाथों में मुझे बेच ही तो दिया। मैंने शादी के बाद कभी अपने पिता की डेअरी नहीं लांघा। मेरे कन्यादान के साथ ही मैंने उनसे अपना रिश्ता तोड़ लिया। रिश्ता निभाती भी तो किस दम पर उन्हें न कल मेरी जरूरत थी न आगे होगी।
मेरे पति मेरे सपनो के राजकुमार के किरदार में फिट नहीं थे मगर वो मेरा ध्यान रखते थे। उनकी पहली पत्नी की मौत हो चुकी थी, उनके बेटे की शादी हो गयी थी और वो अपनी पत्नी के साथ दूसरी जगह रहता था, वो मुझे अपनी मां के समान नहीं मानता, माने भी कैसे अपने से छोटी लड़की को कोई मां कैसे कह सकता, उसे अपने पिता की दूसरी शादी का फैसलपसंद नही आया और उसने वो घर छोड़ दिया। मेरे पति के घर में मेरी सास, पति का छोटा भाई, जिसका गिद्ध दृष्टि सदा मुझ पर टिकी रहती वो मुझे ऐसे घूरता मानो मुझे कच्चा ही चबा जाएगा, उसकी पत्नी जिसे अपनी जमी-जमाई गृहस्थी में मेरा आना कभी अच्छा न लगा और देवर के दो लड़के जिन्होंने मुझे सदा नौकरानी ही समझा।
मैं शादी के सात महीने बाद ही गर्भवती हो गयी। मेरी सास और पति मुझे डाक्टरके यहां ले गये कुछ चेकअप करवाया और मेरा गर्भपात करा दिया। मैंने जब अपने पति से कारण पूछा तो पति ने कहा तुम्हारी उम्र कम है इसलिए डाक्टर ने कहा कि तुम अभी मां नहीं बन सकती। वर्ना तुम्हारी जान को खतरा है। और मैं तुम्हें खोना नहीं चाहता। मुझे बड़ी खुशी हुई कि इतने कष्ट सहन करने के बाद भी पति इतना प्यार करने वाला मिला। अब मुझे अपने अतीत से कोई शिकवा नहीं था क्योंकि मेरा वर्तमान और मेरा भविष्य मुझे सुनहरा दिख रहा था।
लेकिन सच सदा वो नहीं होता जो हमें दिखाई देता है। कई बार सच उनके पर्तों के पीछे छिपा होता है। ऐसी ही कई सच मेरे सामने धीरे-धीरे आने लगे। जब तीन-चार बार गर्भपात करवाया तो, एक दिन मैं अकेली डाक्टर सेमिलने गयी, जो डाक्टर ने कहा वो सुनकर मेेर पैरों तले की जमीन खिसक गयी। मेरा गर्भपात इसलिए करवाया गया क्योंकि मेरे पेट में कन्या थी और हमारे घर में लड़कियों के लिए कोई जगह नहीं थी। जिस पति को मैं भगवान समझ कर अपने भाग्य पर इतरा रही थी मेरा वही पति मेरी बेटियों का कातिल था।
मेरे डाक्टर ने बताया किजल्दी-जल्दी गर्भपात कराने की वजह से मेरे शरीर में खराबी आ गयी है, दुबारा मां बनना मेरे लिए खतरे से खाली नहीं है। जब मैंने अपने पति से इस बारे में बात की तो मेरे पति भड़क उठे, हमारी बहस हाथापायी पर आकर खत्म हुई, और फिर तो यह रोज का क्रमहो गया। मेरी सास मेरे दिन भर के कामऔर गलतियों को बढ़ा-चढ़ा कर मेरे पति को बताने लगी। मेरी हालत उस घर में नौकरानी से कम नहीं थी। दिन भर घर का काम और रात में पति की मार से तन से ही नहीं मन से भी थक गया था।
इसी बीच मेरे घर में ऐसा हादसा हुआ जिससे मेरी जिंदगी बदल गई। एक रात मेेरे पति सोये तो फिर उठे ही नहीं। पांच साल के वैवाहिक जीवन की समाप्ति वैधव्य के अभिशाप के साथ हो गयी। मेरे पति की मौत पर मेरे पीहर से कोई नहीं आया और उस घर के दरवाजे सदा के लिए बंद हो गये।
पति की मौत की बाद जो मानसिक और शारीरिक यंत्रणाओं का दौर शुरु हुआ, वह असहनीय था। मेरे देवर ने मेरा यौन शोषण शुरू किया। दिन में देवरानी और रात में मेरी हालत वैश्या के समान कर दी। उसने कुछ रूपयों के लालचमें मुझे लोगों को परोसना शुरू कर दिया।
क्याकरती मैं कब तक सहती फिर एक दिन मैंने उस घर से भागने का प्रयास किया तो मेरे दवेर ने मुझे पकड़ लिया। पूरे एक सप्ताह तक मुझे भूखा रखा। पानी भी कभी देते कभी नहीं और दोनों समय नंगे तार से मुझे बिजली का झटका देते। जब एक दिन वो जब बाहर गये तो मेरी सास ने मुझे उस कैद से आजाद कर दिया। शायद अपने बड़े बेटे की पत्नी का ये तिरस्कार उनके लिए भी असहनीय हो गया होगा। उस कैद से आजाद करते समय मेरी सास ने कुछ रूपए दिये जिससे मैं मुंबई आ गयी, लेकिन यहां भी मैं सुरक्षित नहीं थी। जीवन जीने के लिए खाना, कपड़ा और छत की जरूरत होती है, जो मेरे पास नहीं थी। एक दिन ऐसे ही फुटपाथ पर सो रही थी तभी मेरे पास एक औरत आई मैं उसे जानती थी, मैंने उसे सिंग्नल पर उसे देखा था वो पागल बनकर वहां बैठी रहती थी। उसने जीने का ये रास्ता बताया और तभी से मैं भी पगली का नाटक कर रही हूं और जिंदा भी हूं और सुरक्षित भी।
आपकी बेटियों को देखती हूं तो अपनी अजन्मी बेटियों की याद आ जाती है। उनकी हंसी मुझे नया जीवन देती है, मैं अपनी बेटियां खो चुकी हूं पर इन्हें कुछ नहीं होने दूंगी।
इतना कह कर वो चली गयी और मैं बुत सी हो गयी। अनजाने रिश्तों पर अपने मातृत्व को लुटाने वाली वो पगली सही मायनों में रिश्तों का महत्व मुझे समझा गयी।
मैंने रात भर सोचा और ये फैसला किया कि आपनी बेटियों को स्कूल लानेले जाने की जिम्मेदारी और मेरे घर का काम करने के लिए उस रख लूंगी, इससे वो भी अपना अतीत भूलकर खुशी के कुछ पल जी लेगी।
दूसरे दिन इतवार था और मेरे पति ने हमें सरप्राइज दिया कि हम आज पूरा दिन बाहर घूमने जाएंगे। मुझे पगली से बात करनी थी उसे ये खुश खबर सुनानी थी कि वो अब मेरी बेटियों के पास हंस खेल सकती है, प्यार कर सकती है। पर मैंने सोचा कोई बात नहीं आकर बता दूंगी।
रात को आने में बहुत देर हो गयी। सुबह पति के ऑफिस जाने के बाद में जब अपनी बेटियों को स्कूल छोडऩे जाने लगी तो देखा पगली सिग्नल पर नहीं थी। मुझे लगा शायद इधर-किधर गयी होगी। मेरी बड़ी बेटी ने पूछा मम्मा आज आंटी दिखाई नहीं दे रही है, वो ये समय तो हमेशा यही मिलती है, उन्हें पता है ये हमारे स्कूल जाने का टाईम है। मैं उसे क्याकहती मैं खुद भी तो यही सोच रही थी।
स्कूल से वापिस आते समय जब पगली वहां नहीं थी तो मैंने पास ही दुकान वाले से पूछा उसने जो बताया वो अत्यंत हृदय विदारक था।
कल कुछ लोग पगली को लेने आये, बता रहे थे कि वो उनके घर से गहने चुरा कर भागी है जब वो जर्बदस्ती उसे ले जाने लगे तो वह उनका हाथ छुड़ा कर सामने आ रही ट्रक की और भागी और ट्रक की एक ही टक्कर ने उसका खेल खत्म कर दिया। जो लोग पांच मिनिट पहले उसे अपने घर ले जाने के लिए उतारू थे वे उसकी लाश देखने भी नहीं गये।
मुझे पता है वो उसका देवर ही होगा, अपनी इज्जत को बेचकर जिस औरत ने उसका घर चलाया, उसी पर गहने चुराने का आरोप। कु छ लोग कितने संवेदनहीन होते हैं। हमारे यहां कुछ दिन यदि कोई जानवर भी रह जाता है तो हमें उससे प्यार हो जाता है और जिस औरत ने अपने जीवन के पांच-साढ़े पांच साल उस घर में निकाले उसकी लाश के प्रति भी इतनी निर्दयता, कहां हैं इंसानियत।
सचमुच ॠतु की जिंदगी ने भगवान ने खुशी और सुख का स्थान बनाया ही नहीं। जिसने अनचाही औलाद के रूप में जन्म लिया और पगली के नाम से इस संसार से विदा ले ली। जिसके जन्म पर कोई हंसने वाला नहीं था वैसे ही मौत पर भी रोने कोई नहीं आया।
मेरी जिंदगी भी यू हीं चलती रहेगी अनवरत पर जो रिश्ता ऋतु ने पगली के रूप में मुझसे बांधा क्या वो जगह वो रिश्ता फिर कभी पूर्ण पायेगा।

-करुणा एस. कोठारी

Karuna s Kothari
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