गैस के दास 400 रुपए हो गए, पेट्रोल के 68 रुपए, दालें 80-100 रु. हरी सब्जियां 20-40 रु. किलो, दूध 50 रु. ली. ये किसी दुकान के बाहर लगी लिस्ट नहीं है। ये तीन-चार सालों में सबसे ज्यादा विकस दो चीजों का हुआ है, पहली महंगाई जो बेटी की तरह बहुत जल्दी बढ़ गयी और दूसरा नेताओं के कारण देश में घोटालों की लिस्ट।
कहते हैं भारत विकासशील देश है, स्वतंत्र देश है। हमारे नेताओं के काले कारनामें देखते हैं तो ये बात सत्य प्रतीत होती है। हमारे नेताओं को तो आज भी यही लगता है कि भारत सोने की चिडिय़ा है तभी तो घोटाले भी हजारों लाखों ने नहीं करोड़ों में करते हैं। विश्व स्तर पर हमारे भारत की जो तस्वीर बन रही है वो भ्रष्ट और घोटालों से परिपूर्ण देश के समान बन रही है, जो भारत के विकास के लिए सबसे बड़़ा खतरा है। आज हर नेता विपक्ष के नेता को दमदार करने में लगा। कहीं बम ब्लास्ट हो, रेल दुर्घटना हो, प्राकृकि आपदजा हो, उग्रवादी घटनाएं हो तो सारे नेता वोट बैंक बढ़ेगा ये सोच कर वहां दौरे पर पहुंच जाते हैं और ये भूल जाते हैं कि जो प्रशासन घायलों की तीमारदारी में लग रहा है वो नेताओं की सुरक्षा में लग जाएगा। फिर विपक्ष के आरोप-प्रत्यारोप में हर नेता भूल जाता है कि देश उसका भी है फिर जो पद पर है वही काम करें ये तो आवश्यक नहीं है। देश के प्रत्येक नागरिक की भी तो कुछ नैतिक जिम्मेदारियां होती हैं, पर ये बात हमारे नेताओं को कहां मालूम?
भारत ऐसा देश जहां लोगों को दो जून की रोटी का जुगाड़ करने के लिए कितनी मेहनत करनी पड़ती है, रहने सोने केे लिए झुग्गियों का साहारा लेना पड़ता है । लेकिन यहां के मंदिरों-मस्जिदों में करोड़ों की कमाई होती है। देश में जगह-जगह धार्मिक स्थल बना है। इन मंदिरों और मस्जिदों की तरह लोग गरीबों की मदद करें तो शायद यह गरीब भी दो वक्त की रोटी अच्छे ढंग से खा सकेगा और अच्छी तरह सकेगा।
कहते हैं पड़ोसी अच्छा हो तो जीवन सुधर जाता है। क्योंकि हम उन्हें कभी भी मदद के लिए बुला सकते हैं, लेकिन भारत के साथ ऐसा नहीं है। उसके एक तरफ पाकिस्तान तो दूसरी तरफ चीन। दोनों भारत की ताकत को कमजोर करने में लगे हैं। हमारी सीमा पर ही उनसे हमें खतरा नहीं है वरन् देश में हो रहे आतंक हमलों के भी वो ही जिम्मेदार हैं।
लेकिन हम…हम अपनी आंतिरक आरोपप-प्रत्यारोप की दुनिया में थम गये हंै। हर बात पर राजनीतिकरण शुरू कर देते हैं जहां हमें एक होकर बाह्य परिस्थितियों का सामना करना है वहीं हम हमारी आंतरिक खींचतान में फसे हैं हम। नेता सिर्फ ये सोच में पड़े हंै कि कैसे हमारी कुर्सी बचे। और आम जनता आंख मूंद कर बैठी है। समाचार चैनल वाले भी विकास में मदद नहीं कर रहे हंै।
अब वक्त आ गया कि हम हमारे नेताओं को लोकतंत्र का सही महत्व समझाएं, हमारी आम आवश्यकताओं को पूर्ण करना ही हमारी जिम्मेदारी न समझे। हमें याद होना चाहिए कि भारत ऐसा राष्ट्र है जहां एक राष्ट्रपति, एक राष्ट्रभाषा, एक राष्ट्रगान और एक विधान है। हमारा ध्वज प्रतीक है हमारी एकता हमारे विश्वास और विकास का। ये हमारे राष्ट्र की अमूल्य धरोहर है जिसे बचाना हमारी जिम्मेदारी ही नहीं तो कवि ”माध्वÓÓ के शब्दों में ”नई सदी में वहीं पुरानी चाल, कुर्सी का किस्सा वहीं-वहीं भ्रष्ट जंजाल। ताला देते घोटाले हंसों की सूरत में बैठे कव्वे काले।
कहे ‘माधव’ कविराय चलो यह शपथ उठाए भारत को उसकी खोई गरिमा दिलवाएं।
कदमों को गतिमान करें और एक ऐसे लोकतांत्रितक देश के निर्माण में अपना योगदान दें।
8/05/2011
कितने स्वतंत्र
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