9/26/2011

क्षमा बडऩ को चाहिए

सितंबर का माह अपने साथ अनेक विशिष्टताओं को लेकर आया है। यह माह लगभग सभी धर्मों के विशिष्ट पर्वो को अपने में समेटे है एक धर्म निरपेक्ष राष्ट्र का धर्म निरपेक्ष महा जहां अगस्त माह भ्रष्टाचार पर गांधीवादी विचारों की जीत और रमजान ईद से समाप्त हुआ वही सितंबर का प्रारंभ सिद्धिदायक गणपति से हुआ। चाहे गणेश चतुर्थी हो या संवत्सरी महापर्व, नवराति हो या ईद सारे त्योहार हमें एक ही प्रेरणा देते है। सयंम रखे, वाणी पर सयंम रखे और आत्म कल्याण कैसे करे यही प्रेरणा मिलती है। ऐसा ही जैन धर्म का सबसे बड़ा और आत्मकल्याण का महापर्व संवत्सरी जिससे नौ दिन धर्माराधना, उपावस, प्रतिक्रमण (अतीत का प्रायश्चित)में ही पूरे हो जाते हैं। पर्व का समापन होता है क्षमा याचना से। ‘क्षमा’ दो अक्षर का छोटा सा शब्द पर इस शब्द को समझने में कई बार पूरा जीवन भी कम पड़ जाता है। इस एक शब्द में विनम्रता, सहिष्णुता, समर्पण, त्याग जैसे गुणों की सृष्टि समाहित है।
जीवन पथ पर चलते हुए जब हम मार्ग में शब्दों के व्यंग्य बाणो की ठोकर खाते है अपने भावनाओं के प्रहार में चूमते शब्द कह देते हैं, रिश्तो के धागों में तनाव की गाठें पडऩे लगती है तब यही एक शब्दा ‘क्षमाÓ उन घावों पर मरहम का काम करता है। और रिश्तों को फिर सहजता की ओर ले जाता है।
‘क्षमाÓ जितना आसान ये शब्द दिखाई देता है क्या सचमुच उतना ही आसान है ये शब्द छोटा मगर सारगर्वित है और उतना ही मुश्किल भी। क्योंकि इसका अर्थ है झुकना, अपनी गल्तियों को स्वीकार करना। लेकिन हमारा अहम, मैं हूं का भाव हमें अपनी गलतियों को स्वीकार करने से रोकता है, हमें झुकने की इजाजत नहीं देता। पर संवत्सरी महापर्व के अंतिम दिन हर पूर्ण विनय भाव से याचक बन कर क्षमा मांग सकते हैं। वैसे तो शासत्रों कहा है कि गलती करती है क्षमा मांग लेनी चाहिए। तब न मांग सके तो प्रतिक्रमण के समय और तब भी नहीं हो सके तो संवत्सरी के दिन तो क्षमा मांग ही लेनी चाहिए। मन के सारे वैर भाव को समाप्त कर एक नया प्रारंभ करना चाहिए। हमने मनुष्य रूप में जन्म लिया है अत: गलतियां होना भी स्वाभाविक है पर उन गलतियों के लिए मांफी मांगना अंग्रेजी के सारी बोलने जितना सहज नहीं है। क्योंकि सारी तो महज एक औपचारिक शब्द है पर क्षमा याचना औपचारिक नही है उसके लिए हमने अहम को समाप्त कर झुकना होता है। जो हमारे भीतर की प्रेरणा के बिना संभव नहीं है। क्षमा मांगना चितना मुश्किल है उससे भी कठिन है क्षमा प्रदान करना, क्योंकि उसके लिए हमारे अहम पर लगी ठेस को भूलना होता है। संक्रमित हुए विचारों को नय दिशा में बदलना होता है। रिश्तों के धागों में लगी गंाठ को खोलना होता है।
संवत्सरी महापर्व पर जैन संघ का सबसे बड़ा पर्व है। जिसमें जप, तप स्वाध्याय, प्रतिक्रमण द्वारा कर्म निर्जरा रूपी महाकुंभ में डुबकी लगाई जाती है और आत्मकल्याण के पथ पर अग्रसर होते हैं। ऐसे महान पर्व पर क्षमा का आदान प्रदान हमारी मैत्री के भाव को पुष्ट कर ‘सव्वे जीवा खमंतुÓÓ के महत्व को प्रतिपादित करता है। भगवान महावीर ने क्षमा का जो रूप प्रस्तुत किया उसमें प्राणी मात्र के प्रति हमारे मन में किसी तरह कलुषता की भावना को स्थान नहीं है, आज जहां छोटी-छोटी बाते विकराल रूप लेकर बदले की भावना से परिणत होकर कई हादसों को जन्म देती है। वहां क्षमा पर्व आज की युगीन आवश्यकता है जिसे सिर्फ जैन धर्म तक ही सीमित न रह कर हर प्राणी को हृदय परिवर्तन के लिए मानना चाहिए। छोटे-बड़े सभी के हृदय में दूसरों के प्रति मैत्री भाव का विकास हो।
दो पल का ये जीवन कब सांसो की डोर टूट जाए। कर लो क्षमा का आदान प्रदान, कही कोई ऋण बाकी न रह जाए।

करुणा एस. कोठारी
करुणा एस. कोठारी

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