ईश्वरीय सत्ता में जब मानव निर्माण का विचार कौंधा तो मानव की उत्पत्ति हेतु माता-पिता की रचना हुई। रिश्तों को ताना बाना बुनना शुरू किया तो रिश्तेदारों की कतारें लग गयी। एक जीव और हजारों रिश्ते कुछ अपने और कुछ पराए। लेकिन तभी एक प्रश्न उठा कि उसे अपने व पराए में अंतर करना कौन सिखाएगा। सही और गलत की पहचान करना कौन सिखाएगा, उसकी अंतरात्मा को सत्मार्ग पर कौन प्रकाशित करेगा। तमाम सवालों के जवाब में एक नाम उभर कर आया है वो ”गुरूÓÓ का।
”गुरू है वादा, गुरू है इरादा,
गुरू है इबादत, गुरू है पूजा।
कुछ नहीं है इससे ज्यादा
गुरू खुदा का नाम है दूजा।।
जीवन को अज्ञान से ज्ञान की ओर, अंधेरे से उजाले की तरफ मोडऩे के लिए सृष्टिकर्ता ने एक नायाब तोहफा मनुष्य को दिया ‘गुरूÓ के रूप मेें। जितना पावन शब्द है, उतना ही पवित्र यह रिश्ता है। एक ऐसा रिश्ता जो रेगिस्तान की तपती धूप में भी सहारे के पेड़ की छांव का एहसास करवाता है। ज्ञान की अलख जगाने के साथ ही कठिन परिस्थितियों में भी धैर्य रखना और आंसुओं को भी खुशी के साथ सह जाना। इस फलसफे को सिखाने की नेमत खुदा ने अगर किसी को बख्शी है तो वो सिर्फ गुरू ही है। जिंदगी का एक बहुत बड़ा सबक सीखा है मैंने अपने गुरू से, एक बार हताश होकर अपने गुरू से मैंने पूछा कि-
”खुशी का इंतजार कब तक किया जा सकता है, आज बहुत दर्द है लेकिन कल ठीक हो जाएगा इस उम्मीद के साथ दर्द को कहा तक सहा जा सकता है?
जो जवाब उन्होंने दिया वो नि:संदेह उनकी परिपक्व सोच का परिचायक था, क्योंकि जवाब था-खुशी का इंतजार तब तक किया जा सकता है, जब तक की आंखों की नमी से पलकों का अंकुरणना हो जाए, या फिर तब तक, जब तक अंकुरण बढ़कर एक बड़े पेड़ का आकार ना ले लें।
मतलब साफ था खुशी तो हमारे भीतर ही है बस हम ही भटकते रहते हैं, ठीक उसी तरह जिस तरह हम भगवान को पत्थर की मूर्तियों में खोजते हैं। ईश्वर तो साक्षात गुरू के रूप में हमारे सामने हैं, जिनका वरदहस्त ही हमारे जीवन का पाथेय है। यह सच है कि रात अंधेरी है और रास्ते उलझे हुए हैं, लेकिन दूसरी बात भी सच है कि जमीन कितनी ही अंधेरी हो, कितनी ही अंधी हो मगर आकाश की तरफ नजर उठाओ तो तारे सदा मौजूद हैं, आदमी के हाथ में चाहे रोशनी न हो फिर भी गुरू रूपी दीपक में रोशनी बाती सदा मौजूद है। किसी भी इंसान की संतनी की गणना की जा सकती है, लेकिन किसी गुरू के शिष्यों की गणना करना नामुकिन है। शिष्य तो किसी भी स्थान पर हो सकता है चाहे फासले मीलों दूरी के ही क्योंन हो, रिश्तों के दरख्त सदा मौजूद रहते हैं। गुरू का किया प्रत्येक कार्य मनुष्य को सिद्धांत का पाठ पढ़ाता है, अत्मावलोकन की सीख देता है। वक्त के साथ इस रिश्ते मेंभी कुछ परिवर्तन हुए थोड़े अच्छे थोड़े बुरे। पहले जहंा गुरू की कही बात या आदेश पत्थर की लकीर हुआ करती थी, उनके आदेशों का पालन करना शिष्यों के लिए अनिवार्य था, चाहे उसका परिणाम सकारात्मक हो या नकारात्मक यह बात मायने नहीं रखती थी। लेकिन आज हालात अलग है, गुजरते समय के साथ इस रिश्ते में और प्रगाढ़ता आई है। पहले की तरह आज के शिष्य गुरू के सामने सर झुकाकर केवल खड़े नहीं रहते बल्कि अपने दिल की हर बात, हर परेशानी वो बेझिझक कह जाते हैं। इस परिवर्तन के साथ ही एक और बदलाव प्रमुखता से इस रिश्ते में आया है-
शिक्षा का व्यापारीकरण जमानेके साथ शिक्षा का स्वरूप भी बदल रह ाहै। पहले जहां बच्चों के संपूर्ण विकास को ध्यान में रखकर शिक्षा दी जाती थी, वहीं आज केवल मात्र पैसा ही ज्ञान की कसौटी बन गया है। जिसके पास पैसा है, शक्ति है, उसके लिए सभी डिग्रियां आसानी से उपलब्ध है, चाहे रिश्वत देकर ही कम काम क्यों न चलाना पड़े। वही गरीब तबके लोग आज भी प्राथमिक शिक्षा तक से वंचित हैं। शिक्षा का जो अखंड स्वरूप था वह खण्डितत हो रहा है। अगर हम वाकई देश को उन्नति की तरफ ले जाना चाहते हैं तो हमें इस नकारात्मक परिवर्तन की धारा को रोकना होगा। क्योंकि भ्रष्टाचार मुक्त होने के बाद शिक्षा का जो रूप निखर कर सामने आयेगा वो तेजस्विता से पूर्ण होगा और उसके तेज से संपूर्ण दुनिया प्रकाशमय होगी। वस्तुत: यह समझना जरूरी है कि गुरू चांद है, पूर्णिमा का चांद दुनिया में चाहे कितनी ही अंधेरी क्यों न हो कोई अंतर नहीं पड़ता तुम उसी यात्रा पथ पर हो जहां गुरू कभी रहा है। इसलिए बिना गुरू के जीवन को खोजना असंभव है।
10/06/2011
‘गुरू’
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