समाज व्यक्ति से या व्यक्ति समाज से ये एक ऐसा प्रश्न है जिसने कई परिभाषा को बदल दिया।
'क्या है समाज ओर क्या है उसकी उपयोगिता' हमारे जीवन मे,हम सिर्फ बोलते है सुनते ही कि मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है वो समाज मे रहता है,उसकी व्यवस्था में सहयोग करता है,उसके विकास में सहभागी बनता है,निज उन्नति को समाज की उन्नति समझता है।
लेकिन आज के परिवेश में ये सब में बदलाव आया है।
कई बार कुछ लोग बोलते है हमने समाज के विकास में अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया है,उसके अर्थ विकास में सहयोग किया है,हमने लोगो को जोड़ा है,अर्थात कही न कही उन्हें ये लगता है कि यदि वो नही होते तो समाज का विकास असम्भव जैसा था,लेकिन ऐसा कुछ नही होता क्योंकि यदि आप नही होते तो कोई और होता,ये आपका सौभाग्य हो सकता है कि आप थोड़े पहले पैदा हो गये तब व्यवस्था जन्म ही ले रही थी तो आपने उसका रखरखाव किया ठीक वैसे ही जैसे एक केअर टेकर करता है।आप मकान नही मकान की ईंट है।यदि कोई व्यक्ति अपने समय श्रम और अर्थ के सहयोग से समाज के विकास में अपना योगदान देता है तो उसे निस्वार्थ भाव से ये करना चाहिए,नई प्रतिभा के जन्म के साथ ही उसे आगे बढ़ाने में भी उन्हें अपना योगदान देना चाहिए,अपने बड़पन्न का परिचय एक आदर्श के साथ प्रस्तुत करना चाहिए।समाज की अपनी व्यवस्था है जहा राजनीति ओर रणनीति नही विश्वास की नीति महत्वपूर्ण होती है।राष्ट्र संत आचार्य तुलसी के शब्दो मे जो समाज के विकास के कार्य मे अपना योगदान देता है वो कार्यकर्ता होता है और कार्यकर्ताओं को कभी केकड़ा प्रवृत्ति नही रखनी चाहिए,जिस समाज मे केकड़ा प्रवृत्ति जन्म ले उस समाज का विकास रुकने की संभावनाएं बढ़ जाती है।
कहते है
"तूफान में अक्सर कश्तियाँ डूब जाया करती है।
और
अभिमान में अक्सर हस्तियां डूब जाया करती है।।"
सबसे पहले तो हम ये जाने की समाजशास्त्र की नजरों में समाज है क्या उसकी अवधारणा क्या है ।
समाज एक समान जाति के लोगो का समूह है।जिसमे समान जाति के लोग अपने सुख दुख खुशी गम त्योहार परम्परा का निर्वहन एक साथ मिल कर करते है।विवाह इत्यादि प्रसंग एक समाज मे ही करते है।
सामाजिक संबंधों का निर्माण तीन स्तरों पर करते है व्यक्ति व्यक्ति के मध्य व्यक्ति समूह के मध्य ओर समूह समूह के मध्य।इन तीनो के मध्य जो भी कार्य होते है आदान प्रदान होते है वो समाज के निर्माण में अपनी भूमिका निभाते है।हमारे व्यवहारों को संतुलित करने का कार्य समाज करता है जिसके लिए वो कुछ नियम बनाता है,ओर उनका पालन उस समाज मे रहने वालों को करना आवश्यक होता है और इसलिए ये भी कहा जाता है कि समाज सम्बन्धो का एक जाल जैसा होता है।ओर इन आधारों पर समाजशास्त्रियों ने मानव जीवन के संबंधों, प्रतिमानों, मूल्यों,आदर्श, प्रथा,मान्यता के विस्तृत ओर व्याप्त जाल को "समाज" की परिभाषा से परिभाषित किया है। समाज के मूल्य प्रथा आदर्श सभी मे समान हो ये आवश्यक नही है हर समाज के अपने मूल्य अपने आदर्श ओर अपने सिद्धान्त हो सकते है और होते है।
गिन्सबर्ग राइट कुले पार्सन्स मैकाइवर जैसे समाजशास्त्रियों की अवधारणा को पढ़े और समझे तो निष्कर्ष में ये कह सकते है कि समाज का वास्तविक आधार सामाजिक संबंध ही है,ओर उसकी एक व्यवस्था है।जिसके अंतर्गत समाज की रक्षा ,कार्यों का विभाजन समूह की एकता और सामाजिक व्यवस्था में स्थिरता मुख्य कार्य हो सकते है।
आज के समय मे समाज की अवधारणा में कुछ बदलाव आए है।
अर्थ की व्यवस्था के लिए व्यक्ति अपने समाज को गांव को छोड़ कर नगरो ओर महानगरो में आये और उन्होंने वह की संस्कृति को अपनाया जिससे कही न कही पुराने मूल्य कमजोर हुए,अंतरजातीय विवाह ने समाज की अवधारणा को बदला है,पहले विवाह के लिए कुछ नियमो का पालन सबके लिए जरूरी था जुसमे जाति व्यवस्था अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती थी लेकिन अब उसमे भी ढील दी गई है।आज युवा वर्ग का झुकाव समाज से ज्यादा दोस्त पाश्चात्य संस्कृति की तरफ हुआ है उनके लिए समाज मायने रखता है लेकिन अपने सुख और इच्छाओं की पूर्ति ज्यादा महत्व रखती है।
बीसवीं सदी के समाज में कई बदलाव को देखा गया पहले लोग एक व्यक्ति की बात को बिना तर्क के भी स्वीकार कर लेते थे लेकिन आज सही गलत की सोच को व्यक्ति की बातों को तर्क की कसौटी पर परखने में विश्वास रखते है।समय के साथ समाज की अवधारणा में आये बदलाव को स्वीकार करते हुए कुछ नियमो के मूल्यों के निर्धारण में पुनः सोचना चाहिए क्योंकि समाज वो इकाई है जिसने समय समय पर हुए बदलाव को स्वीकार किया है।
11/21/2018
व्यक्ति समाज से है,समाज व्यक्ति से नहीं।
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