5/27/2018
3/22/2018
मुहावरो के बदलते अर्थ
बच्चो के एग्जाम शुरू हो गए और कुछ बच्चो के लिए हिंदी को समझना जंग जितने जैसा होता है।
ऐसे में मेरे एक पहचान वाले ने फ़ोन करके बोले कल बेटे के हिंदी का एग्जाम है कुछ मुहावरो के अर्थ बात दो।
मेने हां कर दी तो उसने फ़ोन बच्चे को दे दिया और आज के बच्चो को समझाना इतना भी आसान नही आज पता लगा।आप भी मुहावरो का आनंद लीजिये।कुछ मुहावरो में 3 4 मुहावरे ऐसे थे जिनके अर्थ को उसने अपने तरीके से समझ कर मेरे अर्थ को ही बदल दिया।
"चुड़ैल भी एक घर छोड़ती है" :- मेरा उत्तर था कि कुछ लोग बहुत बुरे हो सकते है वो दुसरो के अहित की चिंता नही करते है ओर अपना काम हो बस यही ध्यान रखते है और सिर्फ अपना ओर अपने परिवार का ही सोचते है ।
इस पर बच्चे का रिप्लाई था कि ऐसा कैसे जब वो जान कर या अनजान में किसी का भी अहित करते है तो असर तो उनके परिवार पर भी होगा न।उनके बच्चो को पता चलेगा तो कितना दुख होगा कि हमारे माता पिता ने कितना गलत किया फिर उनका घर कैसे बचेगा।ओर वो उन्ही घरो में तो अहित करेंगे जो उनका विश्वास करते है।🤦🤦🤦
"धोबी का कुत्ता न घर का न घाट का" :- ये मुहावरा समझने के लिए मुझे धोबी ओर उसकी पत्नियों के झगड़े की पूरी स्टोरी सुनानी पड़ी और उसे इतना अच्छे से समझ मे आया कि एक ही लाइन में समझा गया कि अच्छा वो चुड़ैल जो अपने घर की भी नही हुई और बाकी घरो को छोड़ा भी नही ।तो ना वो घर की ना घाट की🤦🤦🤦
मेने पूछा तुम्हे सब पता था तो मुझसे क्यो पूछ रहे तो बोलै मम्मा ने बोला आप अच्छे से समझा देगी तो में आपका एग्जाम ले रहा था।
समझ मे नही आ रहा मेने जो सीखा वो सही या इस नन्हे गुरु ने सिखाया वो।
9/02/2015
What we should talk
A Short Article On
What We Should Talk?
We have many things to talk but we don't talk to our family members .We think that there is nothing to talk. But we are wrong. We have much things to talk but we don't think about it. But with our friends we don't think to talk. So why do we think to talk with our family members. So we just think and think and not talk with our family members. And we say a lot of things to our friends which we can talk to our family members. But we think that we should not talk this to your parents or else our parents will beat us but actually we are wrong. Parents will beat us but the parents are only which can help to find our solutions. But sometimes parents also not spend time with their children and family and gets busy with their friends. So parents should also spend time with family and we should also spend time with our family.
I am just saying to everyone to spend with their family.
--- Hemil Kothari
11yr
12/09/2014
ये केसी ख़ुशी
अच्छी कंपनी का जॉब छोड़ कर घर बेठना आसान नहीं होता।पर में पिछले 6माह से घर ही हु क्योकि 6 माह पहले भगवान् में मुझे दुनिया की सबसे बड़ी ख़ुशी से नवाजा और मेरे घर एक नन्ही कली को भेज दिया।मातृत्व के अहसास के साथ ही नोकरीपेशा हु ये तो भूल ही गई थी।
ससुरजी के खाने की समस्या के चलते सास गांव जाने लगी तो मुझे भी साथ चलने को कहा उन्हें लगता था की अभी मेरी बेटी को मेरे साथ सबकी जरुरत हे पर में नहीं जा पाई।
कल जब ऑफिस से फ़ोन आया तो मम्मीजी ने साफ मना कर दिया ऑफिस जाने के लिए, पर एक अच्छी बाई को रख कर मेने ऑफिस ज्वाइन कर ही लिया।
इतना आसान नहीं था बच्ची को खुद से दूर रखना पर बाई ने उसकी सारी जिम्मेदारी अपने सिर ले ली और में निश्चिन्त हो गई।
पता नहीं क्यों कुछ दिनों से गुड़िया में अजीब बदलाव आया वो रात को सोती ही नहीं एक तो ऑफिस की थकान और उस पर उसका रोना ,समझ में ही नहीं आता हो क्या रहा हे।बाई को बोल दिया इसे दिन में कम सुलाया करो रात को बहुत परेशान करती हे।
आज सुबह से तबियत ठीक नहीं थी पर ऑफिस में जरुरी मीटिंग थी तो सोचा मीटिंग अटेंड करके आ जाउंगी और दिन में बाई गुड़िया को रखेगी तो नींद भी पूरी कर लुंगी।
ट्रैफिक सिग्नल पर लाल बत्ती आते ही भिखारियो का झुण्ड गाडियो के आसपास आ गया ,बेचारे केसा जीवन जीते तीन चार माह के बच्चों को लेकर भीख मांगते है।
मेरी गाडी के आगे भी एक दयनीय युवती पांच छह माह के बच्चे के साथ आकर खड़ी हो गई,वेसे में ऐसे लोगो को कुछ देती नहीं पर पता नहीं क्यों उस औरत को 10 रूपये देने के लिए कांच निचे किया।
और उसे देखते ही सन्न रह गई उसके हाथो में मेरी फूल सी गुड़िया रानी थी।ऐसा लगा जेसे ये जमीं यही फट् जाए और में इसमें समा जाऊ,आज मम्मीजी की बात याद आ रही थी बेटे नोकरी की जिद में कही बच्ची का भविष्य न बिगड़ जाए,बच्चे कामवालियो के भरोसे नहीं बड़े होते।मुझसे कितनी बड़ी गलती हो गई।
उस औरत को अपने साथ गाडी में बिठाया और पति को मेसेज किया की जल्द से जल्द पुलिस को लेकर घर पहुचे।पुलिस को देख कर दोनों औरतो ने सच बोल दिया कितना घिनोना सच::::
जिस कंपनी से हमने कामवाली को रखा वहा पुलिस ने छापा मार कर मालिक को पकड़ लिया तब पता चला की नोकरीपेशा माँ बाप के बच्चों को भीख मांगने में इस्तेमाल किया जाता हे और बच्चे परेशान ना करे इसलिए उन्हें कफ सिरप पिला कर सुला दिया जाता है।
9/26/2014
गठबंधन
कल शिवसेना भाजपा का 25 वर्षो का रिश्ता टूट गया। कल ही एनसीपी और कोंग्रेस का 15 वर्षो पुराना रिश्ता भी टूट गया।
एक साथ दो बड़े गठबंधन खुल गए,और वर्षो से सहेजे रिश्तो में गांठ आ गई।
चुनाव से पहले हर बार ऐसा ही होता है,राजनितिक उठापठक के बाद रिश्ते बनते बिगड़ते है।
25 वर्ष हो या 15 वर्ष कोई कम नहीं होते।इतने वर्षो बाद रिश्तो का टूटना आम इंसान पर कोई अच्छी छाप नहीं छोड़ता। आज का वोटर इन हालातो के बाद बड़ी दुविधा में है की उसे किसका साथ देना है। पार्टी के नाम पर वोट देने वाले अब अवश्य चिंतन करेंगे की कही जिन लोगो के खिलाफ आज पार्टी वाले बोले कल फिर गठबंधन तो नहीं कर लेंगे। या फिर चुनावी माहोल में गर्मी लाने के लिए इन गठबन्धनो को टुटा हुआ बताया हो,जबकि अन्दर से सब मिले हो।या फिर उसे वोट दे जो भले किसी बड़ी पार्टी का नेता न हो पर जमीन से जुडा कार्यकर्त्ता हो। सिर्फ वादों के पुलिंदो और दिखावटी अपनेपन से दूर आम इंसान की तकलीफों में सहयोगी हो।।।।
क्योकि जो वर्षो तक साथ रह कर एक दुसरे के नहीं हुए वो जनता के क्या होंगे।
9/18/2014
एक मुलाकात समाज के साथ
कल मुझे एक बुजुर्ग महाशय जर्जर अवस्था में मिले। बड़ी ही दयनीय हालत थी उनकी,किसी को भी उन्हें देखकर तरस आ जाये। पैर में जुते नहीं वस्त्र फटे हुए, शरीर की भी दुर्दशा लेकिन इन सबसे ऊपर उनके सर की पगड़ी। एकदम चमकती हुई सोने चांदी के तारो से दमकती रेशम की पगड़ी जिस पर रत्न आभूषण टंगे हुए।
देखकर यकीं नहीं हुआ की ऐसे इंसान के पास इतनी महँगी पगड़ी?? अपनी जिज्ञासा के समाधान के लिए मेने उनसे पूछा:-बाबा आप कौन है और इस हालत में कैसे। आपके वस्त्र फटे हुए क्यों?आपने जुते क्यों नहीं पहने आपकी उम्र भी 100 के आस पास होगी फिर भी आप अकेले घूम रहे है।आपके वस्त्रो के पेबंद बताते है की आप बहुत गरीब है लेकिन आपके सर की पगड़ी कुछ और ही कहती है,मेरी सोच काम नहीं कर रही कृपया मुझे बताये आप कौन है? कहा से आये कहा रहते है।
बाबा बोले :- बेटी में गरीब नहीं हु बहुत ही समृद्ध हु,और तबसे हु जब से भारत है।"में समाज हु"। मुझे आश्चर्य हुआ
मेने पुछा :-आप किस जाती के समाज हो। सुनकर बाबा हँसने लगे
उन्होंने कहा:-जाती???? बेटी समाज जाती से नहीं होता जातिया समाज से होती हे ,पर तुम क्या जानो तुमने तो जन्म ही जाती व्यवस्था के बाद लिया।
आज समाज व्यवस्था के नाम से मनुष्य मनुष्य को बाँट चूका है। एक दुसरे को बड़ा बताने में इतनी खीचँतान हो रही हे की जीव योनि के सबसे समृद्ध जीव ने मेरे कपडे भी फाड़ दिए।स्वयं को महान बताने के चक्कर मुझे ऐसी दयनीय अवस्था में ले आया और इसीलिए मेरी ये हालत है।
मेने पूछा:-पर बाबा आपकी ये पगड़ी????
बाबा बोले:-ये वो सफेदपोश लोग हे जिनके वस्त्र दिन के उजाले में तो सफेदी की चमकार से चमकते है पर रात के अंधेरो से ज्यादा उनके काले कारनामो ने उनकी आत्मा तक को मलिन और काली बना दिया है।लोग उनकी सच्चाई को जानते हे फिर भी उन्हें सम्मान देते हे,सत्य के को पीछे कर उन जैसे लोगो को अग्रिम पंक्ति में खड़ा करते है,सिर्फ पैसो के कारण इनका सम्मान करते उन्हें अपना सिरमौर बनाते है इसलिए मेरी पगड़ी इतनी महँगी है।
बाबा की सारगर्भित बातो ने मेरे ह्रदय को झकझोर दिया और सोचने पर विवश किया की क्या सचमुच हम मनुष्य है? सामाजिक प्राणी है?
कहलाने को तो हम समाज में जीते है नई पीढ़ी में संस्कारो का सृजन करते है,नए युग का निर्माण भी करते है,पर क्या सच में मनुष्यता है हम में????
पैसो ने हमारे बिच एक ऐसी दिवार बना दी जिसने भाई को भाई के खून का प्यासा कर दिया वृद्ध माता पिता को वृद्धाश्रम की राह दिखा दी ,पति पत्नी के विश्वास के रिश्तो में शक भर दिया,पिता पुत्र के रिश्तो में खटास पैदा कर दी।
आज जब परिवार की नीवं ही मजबूत नही रही तो समाज कैसे मजबूत होगा। अब वक़्त आ गया जब पैसो के मोह से दूर होकर हम सही इंसान की पहचान कर पाए,उन जीवन मूल्यों को समझ पाए जो पैसो से नही बल्कि आपसी संबंधो की मिठास से सम्यक जीवन दर्शन से आते है,सही मार्गदर्शन से आते है।
पहले ये कार्य धर्म गुरु करते थे। उनके यहाँ छोटे बडे अमीर गरीब का कोई भेद नहीं था। लेकिन आज ज्यादातर धर्मगुरु अपना पक्ष ऊँचा रखने के लिए सही गलत की जानकारी होते हुए भी गलत को आगे ला रहे है जो उनके बताये धर्म का प्रचार प्रसार करे। आज धर्म व्यवसाय बन चूका हे, टी वी पर अपना भाषण अखबारों में फोटो और सभी कार्यक्रमों को भव्यतम रूप देना चाहते है।
इसलिए समाज व्यवस्था लडखडा गई है,आडम्बर ने अपने पाँव पसार लिए हे।
अब वक़्त आ गया समाज व्यवस्था के पुर्ननिर्माण का,पुनः निरिक्षण का,समाज में व्याप्त बुराइयों से लड़ने के लिए युवा पीढ़ी को आगे आने का।
तो कदम बढ़ाये और स्वस्थ समाज के योगदान में सहयोगी बने। काली आत्मा वाले सफेदपोश को समाज की अग्रिम पंक्ति से हटा समाज के सही व्यक्ति को सम्मान दे। तभी फिर से जर्ज्रावस्था में पहुचे समाज को सही मान सम्मान मिल पायेगा।
स्वस्थ समाज और स्वस्थ राष्ट्र का निर्माण हो पायेगा।
5/01/2014
अक्षय तृतीया का महत्व
विश्व विज्ञान के प्रथम प्रस्तोता भगवान ऋषभदेवको वर्ष भर आहार उपलब्ध नहीं हुआ। कारण कुछ भी रहा हो किन्तु सुदीर्घ तप प्रभु ने जो उस समय सिद्ध किया वह अपने आपमें तप साधना का एक अदभुत इतिहास बन गया। जो सदियों कीयात्रा करते हुए आज तक धर्म जगत को आंदोलित, प्रभावित करता रहा। वर्षी-तप के उसइतिहास को आज भी हमारे तपस्वी जन सुदीर्घ तपसाधना कर जीवंत रखे हुए हैं। यह अलग बात है कि उसकी परिभाषा तो नहीं बदली किन्तु उसकीप्रक्रिया में कुछ परिवर्तन आया जो आज के तपस्वीजनों के शारीरिक योग्यता के अनुरूप ही है। एक वर्ष तक उपवास और पारणे का क्रम अविकल रूप से चलता है। तप में उपवास के उपरान्त वेला-तेला आदि तप का आधिक्य हो सकता है किन्तुकिन्तु पारना तो एक ही करना होता है। उसके बाद अगले दिन उपवास ही करना होता है।एक-एक वर्ष के दो तप अनुष्ठान करके एक वर्षी-तप की पूर्ति मानी जाती है जो आज कीशारीरिक परिस्थिति के अनुकूल ही है।तपश्चर्या का क्रम पूर्ण होते ही ये तपस्वी इक्षु-रसग्रहण कर अपना पारणा करते हैं। यह भी परमात्मा भगवान ऋषभ देव के इक्षु-रस से हुएपारणे का ही अनुगमन है।एक वर्ष निराहार रहने पर भगवान ऋषभ देव का पारणा श्रेयांश कुमार नाम के एक सम्पन्न व्यक्ति द्वारा अकस्मात ही इक्षु-रस द्वारा संपन्न हो गया था। वह नहीं जानता था कि उसके यहाँ उपलब्ध हुआ इक्षु-रस इतना परमोपयोगी हो जायेगा। हमारे यहाँ पारम्परिक कथानक तो ऐसा है कि प्रभु को किसी ने आहार दिया ही नहीं। महान महिमावान होने के कारण प्रभु को मात्र मूल्यवान वस्त्र ही देना चाहा जिसे उन्होंने नहीं लिया। एक वर्ष तक किसी ने आहार का आग्रह नहीं किया होगा यह बात समझ से बाहर है। यह हो सकता है कि सभी ने श्रेष्ठ स्वदिष्ठ गरिष्ठ आहार देने का आग्रह किया हो किन्तु एन्द्रिक रस विजेता परम पावन परमात्मा ने वह आहार ग्रहण ही नहीं किया। परमात्मा के सामने जो आहार आया होगा वह विकृति जन्य होगा। दूध दही घृत तेल एवं कृत्रिम मिष्टान वाला ऐसा आहार सुदीर्घ तपश्चर्या के अंतर्गत प्राय: अग्राह्य ही रहता है।वैसे सभी तपस्वियों का आज भी यही अनुभव रहता है कि पारणे में गरिष्ट आहार देह को सुस्ती और बेचैनी प्रदान करता है। पारणे में हल्का सुपाच्य और विकृति मुक्त आहार होना आवश्यक है।इक्षु-रस ही क्यों ?भगवान श्रेयांस कुमार के द्वार पर आये वहां उसके अपने कार्य हेतु इक्षु-रस उपलब्ध था। उसने निर्दोष और सहज उपलब्ध इक्षु-रस का आग्रह कर लेना उचित समझ कर भाव-भक्ति पूर्वक निवेदन किया और प्रभु ने कर-पात्र आगे कर दिया। एक वर्ष से भी अधिक दिनों से निराहार थे अत: इक्षु-रस यथेष्ठ रूप में ग्रहण कर अपना पारणा किया।अन्य वस्तु छोड़ मात्र इक्षु-रस ही क्यों ग्रहण किया ? इस प्रश्न का उत्तर इक्षु-रस में प्रकृति वश सहज मीठास और उसकी गुणवत्ता में निहित है।इक्षु-रस शक्ति प्रद, क्षुधा रोधी और सहज माधुर्य लिए एक स्वादिष्ट पेय है, जिसमें कहीं भी कोई कृत्रिमता नहीं है। इक्षु-रस का चिकित्सीय विश्लेषण करें तो यह कई तरह से स्वास्थ्य के लिए हितावह सिद्ध होगा। अनेक शारीरिक व्याधियों का उपचार इक्षु-रस के माध्यम से भी होता है। समस्त विकृतियों से मुक्त इक्षु-रस एक प्राकृतिक पेय है, उसकी सात्विकता का महत्व देकर प्रभु ने इसे ग्रहण किया।विश्व में अनेक प्रकार के कृत्रिम पेय निर्मित हो गए हैं। स्वाद और वर्ण की दृष्टि से वे आकर्षक हो सकते हैं किन्तु स्वास्थ्य के लिए जो सौम्य गुण प्रदान करने का प्रश्न है वह तो इक्षु-रस में ही है। अन्य पेय में यह गुण सर्वतोभावेन नहीं पाया जाता है।इक्षु-रस में जो प्राकृतिक सरसता है वह तो निश्चय ही बेजोड़ है। रस वाले फल तो अनेक हैं किन्तु सम्पूर्ण पौधा ही सरस हो ऐसा और कोई पौधा देखने में नहीं आया। विश्व में इक्षु ही एक ऐसा पौधा है जो मूल से लेकर शीर्ष तक रस पूर्ण होता है। अक्षर वृक्षों के फल सरस होते हैं किन्तु यहाँ तो पूरा पौधा ही सरस है। यह निश्चित ही इस पौधे की विलक्षणता है।इक्षु के रस में सरसता मिट्टी पानी आदि से सीधी आती है। अन्य फलों में पौधों के माध्यम से आती है।भारतीय संस्कृति में इक्षु दंड को अति मंगल मय माना जाता है यही कारण है कि दीपमालिका और अन्य उत्सवों के अवसर पर इक्षु-दंड स्थापित किये जाते हैं।लोक मंगल का प्रतीक इक्षु उसके रस से विश्व मंगल के प्रणेता परमात्मा भगवान ऋषभ देव ने पारणा किया।सुदीर्घ तपश्चर्या के कारण कोष्ठ का संकुचन स्वाभाविक है। उस स्थिति में सम शीतोष्ण इक्षु-रस ही पारणे के लिए सर्वथा उचित रहता है। जिससे कोष्ठ पुन: क्रमश: विकसित होकर कार्य करने लग जाये।यही कारण है कि आज भी वर्षी-तप के तपस्वी इक्षु-रस से ही पारणा करते हैं। कितनी ही सुदीर्घ तपश्चर्या क्यों न हो यदि इक्षु-रस को अल्प मात्रा में लेकर पारणा किया जाये तो वह पारणा अवश्य सफल होगा।अनेक व्यक्तियों की यह धारणा है कि इक्षु-रस भारी होता है। यह इसलिए सही हो जाती है क्योंकि हम हर चीज़ को पेट भर कर खाने-पीने के आदी हैं। यदि अन्य कोई पदार्थ न लेकर बहुत थोड़ी थोड़ी मात्रा में समय अन्तराल के साथ इक्षु-रस लिया जाये तो यह भारी नहीं होगा। किन्तु स्वास्थ्य के लिए सर्वश्रेष्ठ होगा। यह अनुभव सिद्ध सत्य है।
4/22/2014
1/12/2012
छुटकारा
10/16/2011
कहीं हम अमीर न बन जाए
देश के बिगड़ते हालात, घोटाले के बढ़ते ग्राफ व्याप्त अराजकता के कारण मुझे जो चिंता थी वो सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले ने कम कर दी है। देश में कुछ नेताओं से कितने भी घोटाले हो पर आज भी आम जनता में इतनी ताकत है कि वो अपने फैसलों से सरकारे हिला सकें। मैंने कहा बापू अभी तो सुप्रीम कोर्ट ने ऐसा कोई फैसला नहीं सुनाया जिस पर खुश हुआ जा सके।
बापू बोले- सुप्रीम कोर्ट ने गरीबी रेखा के नीचे जीने वालों की कमाई (प्रतिदिन) का जो आंकड़ा तय किया है वही देश को बदल देगा। मैंने पूछा कैस? बापू ने कहा-देश की आम जनता के मन में अब अमीर होने की चाह नहीं बची अब वो अपनी कमाऌई टैक्स, वैट में नहीं देना चाहते हैं। सोचो तुम कही रिक्शे से जा रही हो और जहां जाना है वहां का किराया 40 रू. हो और रिक्शे वाला सिर्फ 3 या 4 रू. ही मंागे तो? मैंने कहा मेरा तो ब्लड प्रेशर ही कम हो जाएगा। बापू बोले वही तो रिक्शे वाला चाहता है वो दिन भर में 32 रू. से ज्यादा न कमाए। ऐसा ही हाल है पेट्रोल पम्प वालों का हो रहा है बेचारे 68 रू. लीटर पेट्रोल पर लोग डेढ़, दो रू. लीटर के भाव से ले रहे है क्योंकि उनकी वो 68 रू. जितनी तो कमाई भी नहीं हो रही है। सब्जियां 2 से 5 रू. किलो बिक रही है, दालें 4-5 रू. किलो, गैस की टंकी 10 रू. की। हर इंसान यही चाहता है कि पूरे दिन का लेन देन के बाद उसकी कमाई गांवो में २६ रू. और शहर में 32 रू. ही हो। कोर्ट के एक ही फैसले ने देश की व्यवस्था बदल दी।
मैंने कहा-स्वप्न अच्छा है, पर सच कभी नहीं होगा। बापू ने कहा-होगा बेटा, देश की आम जनता जाग रही है वो सोचती है इतना कमा कर सरकार को को टैक्स भरो और वही पैसा नेता डकार जाते हैं। इससे तो अच्छा कि हम अमीर ही नहीं बने। शिक्षा, चिकित्सा तो सरकार फ्री देगी ही। लेन देन भी बार्टर प्रणाली से कर लेगे। नेताओं को कुछ खाने नहीं देंगे। क्योंकि बरसो से इतने घोटाले हुए फिर भी किसी नेता को कोई सजा नहीं और आम जन क्यों दिन रात पिसें। बल्कि इन्हें जितनी तनख्वाह मिलती है, अब तो देश के खजाने में भी टैक्स के रूप में उन्हें ही पैसा भरना पड़ेगा। मैंने कहा-बापू सच में ऐसा हो जाए तो मजा आ जाए। नेताओं को, भ्रष्ट कर्मचारियों को तो ऐसा सबक मिल जाएगा, बेचारे धोबी के कुत्ते बन जाएंगे। जब चीजें इतनी सस्ती हो जाएगी, सभी गरीबी रेखा के नीचे जीवन यापन करेंगे तो सरकारी खजानों में तो लूटने जैसा कुछ बचेगा ही नहीं और इस बार भारत सोने की चिडिय़ा अवश्य ही बच जाएगा। पर बापु यहां हार्न की इतनी आवाजें क्यों आ रही है तभी कान में स्वर पड़ा ए कबसे बीच रास्ते में गाड़ी कर रखी है। लाइसेन्स दाखव गाड़ी साईड में कर। और सारे पेपर सही होने के बाद भी हवलदार बोला लाइसेन्स चाहिए तो 300 रू. देकर ले लेना। और ये सोच रही थी क्या बापू का यही सपना था, रिश्वत मुझसे मांगी जा रही थी और सामने बापू की मूर्ति मुस्कुरा रही थी।
करुणा कोठारी